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पूरी तरह से हाशिए पर धकेल दी गई हैं दलित महिलाएं

Posted by MKB on February 1st, 2010

कांग्रेस और दूसरी पार्टियो ६२ साल के सत्ता सुख को संयुक्त राष्ट्र का तमाचा|
संयुक्त राष्ट्र ने चौंका देने वाले कुछ आंकड़ों और निष्कर्षाें के साथ एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें कहा गया है कि भारत में दलित और खासकर दलित महिलाएं पूरी तरह से हाशिए पर धकेल दी गई हैं जो इस समाज के प्रति नाकारात्मक नजरिए की चरम स्थिति का उदाहरण हैं। संयुक्त राष्ट्र की विश्व सामाजिक स्थिति रिपोर्ट 2010 में कहा गया है कि भारत, नेपाल और पाकिस्तान के समाज में जाति आधारित व्यवस्था के कारण निचली जाति के लोग बहिष्कार के शिकार हैं। हर दो वर्ष में तैयार होने वाली संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग की इस रिपोर्ट में 1981 से 2005 के बीच की जनसंख्या के आधार पर विश्व की सामाजिक स्थिति का आकलन किया गया है। हाल ही में नई दिल्ली में जारी हुई इस रिपोर्ट में भारत के संदर्भ में कहा गया है कि देश में रहने वाले दलितों की खासकर सेहत के मामले में स्थिति काफी गंभीर है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में दलितों से इतर अन्य जातियों की आबादी में 44 फीसदी बच्चे कम वजनी होते हैं, जबकि उचित खान पान नहीं मिलने के कारण दलितों के 54 फीसदी बच्चे कम वजनी होते हैं। अन्य जातियों में प्रति हजार शिशुओं में से 68 की मौत हो जाती है, जबकि इसके मुकाबले प्रति हजार दलितों में से 83 शिशु जन्म लेते ही दम तोड़ देते हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट कहती है कि दलितों के हर एक हजार में 11 बच्चों की पांच वर्ष या उससे कम उम्र में ही मौत हो जाती है, जबकि शेष आबादी में यह आंकड़ा प्रति हजार 9 बच्चों का है। दलितों के लिए आरक्षण का समर्थन करने वाले संगठनों के लिए यह रिपोर्ट एक और मजबूत साक्ष्य है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में दलित परिवारों के मुकाबले ऊंची जातियों के परिवारों में वस्तुओं के प्रति परिवार उपभोग में होने वाला व्यय 42 फीसदी ज्यादा है। अर्थशास्त्री और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की अर्थशास्त्र विभाग की प्रोफेसर जयंती घोष ने कहा कि रिपोर्ट के निष्कर्ष वाकई चिंताजनक हैं और हम दलितों को रोजगार के अवसर मुहैया करा कर ही उनकी समस्याएं दूर कर सकते हैं। राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना नरेगा के जरिए एक शुरुआत जरूर हुई है। इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में जिन लोगों को रोजगार के अवसर मिल रहे हैं, उनमें एक वर्ग दलितों का भी है। फिर भी हमें अब भी लंबी दूरी तय करनी है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में दलितों के लिए सरकारें जो कर रही हैं, वह महज सांकेतिक है। संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट में भारतीय दलित महिलाओं की स्थिति पर विशेष तौर पर चिंता जताई गई है। इसमें कहा गया है कि दलित महिलाएं दोहरी हिंसा का शिकार होती हैं। उनके साथ होने वाली हिंसा में शारीरिक प्रताड़ना, यौन उत्पीड़न, बलात्कार, जबरन वेश्यावृत्ति, अपहरण, कन्याभ्रूण हत्या और घरेलू हिंसा शामिल हैं। भूमि स्वामित्व के मामले में निचले तबके के लोगों को बेदखल कर दिया जाता है। निचली जाति की महिलाएं इसलिए प्रभावित होती हैं क्योंकि उन्हें पहले से हाशिए पर मौजूद अपने समुदाय के भीतर भी कम अधिकार प्राप्त होते हैं। यही कारण है कि उनका खराब आर्थिक स्थिति से उबरना अपनी ही जाति के पुरुषों के मुकाबले मुश्किल हो जाता है। आर्थिक विकास से जुड़े मामलों के लिए संयुक्त राष्ट्र के सहायक महासचिव जोमो क्वामे सुंदरम कहते हैं कि हमने निचले तबकों की मदद के लिए बांग्लादेश में सूक्ष्म ऋण (माइक्रो क्रेडिट) के उदाहरण देखे हैं। उन्होंने कहा कि हमारा यह सुझाव है कि गरीब आबादी जहां रह रही है, उस भूखंड के कुछ हिस्से का उन्हें स्वामित्व दिया जा सकता है। इसके बाद वे उस भूखंड को रेहन (माटगेज) रखकर कर्ज ले सकते हैं। हालांकि असमानता फिर भी बनी ही रहेगी जबतक कि संपत्ति अधिकार में बराबरी का हक नहीं मिल जाता। अभी भी देश के कई हिस्सों में कृषि भूमि को लेकर पहाड़ जैसी गैरबराबरी है।
Reference: Jagran

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