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बाबा साहेब डाक्टर भीम राव अंबेडकर चाहते थे मुंबई को अलग राज्य का दर्जा मिले
मुंबई शिवसेना और मनसे भले ही मुंबई को सिर्फ मराठियों की नगरी सिद्ध करने पर तुले हों, लेकिन महाराष्ट्र निवासी संविधान निर्माता डॉ.भीमराव अंबेडकर ने महाराष्ट्र के गठन से पांच साल पहले ही यह सुझाव दे दिया था कि मुंबई को अलग राज्य का दर्जा दे दिया जाना चाहिए । अंबेडकर ने 1955 में भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का विरोध करते हुए एक पुस्तिका प्रकाशित की थी, जिसमें उन्होंने महाराष्ट्र के चार हिस्से करने की सलाह दी थी। उनके अनुसार, एक हिस्सा शहरी महाराष्ट्र का होना चाहिए, जिसमें सिर्फ मुंबई को लिया जाना चाहिए। दूसरा हिस्सा पश्चिम महाराष्ट्र का होना चाहिए, जिसमें ठाणे के अलावा पूरे कोकण क्षेत्र,सातारा, पुणे और कोल्हापुर को शामिल किया जाना चाहिए। मध्य महाराष्ट्र में खानदेश,नासिक, अहमद नगर, सोलापुर और समूचा मराठवाड़ा क्षेत्र तथा चौथा हिस्सा पूर्वी महाराष्ट्र का होना चाहिए, जिसमें समूचे विदर्भ को लिया जाना चाहिए। हालांकि उस समय शिवसेना का दूर-दूर तक पता नहीं था। महाराष्ट्र राज्य का गठन भी नहीं हुआ था। इसके बावजूद दूरदर्शी अंबेडकर ने अपनी पुस्तिका में शिवसेना की आज की चिंताओं पर भी प्रकाश डाला था। उन्होंने कहा है कि महाराष्टि्रयों को बॉबे को अलग राज्य का दर्जा दिए जाने से चिंतित नहीं होना चाहिए क्योंकि अलग राज्य बनने के बावजूद कोई उन्हें बॉबे से निकाल नहीं सकता। अंबेडकर मराठा नेताओं की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा पर भी प्रकाश डालना नहीं भूले। उन्होंने सुझाव दिया था कि यदि एक बड़े महाराष्ट्र राज्य के बजाय तीन छोटे मराठी भाषी राज्य बनते हैं तो तीन मराठा नेताओं को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिल सकता है । वास्तव में अंबेडकर भाषाई आधार पर राज्यों के बंटवारे के ही खिलाफ थे। उनका मानना था कि इससे हर भाषाई राज्य में अलगाववाद को बढ़ावा मिलेगा। उनके अनुसार दो पृथक भाषाओं के राज्यों एवं दो राष्ट्रों में फर्क बहुत बारीक होता है। इसलिए यदि भाषाओं के आधार पर राज्यों का गठन होता है तो दो भिन्न भाषाओं के राज्य अपने-अपने हितों की लड़ाई लड़ने में पीछे नहीं रहेंगे। अंबेडकर भाषा के बजाय प्रशासनिक सुविधा के अनुसार छोटे राज्यों का गठन चाहते थे। ताकि पूरे देश को समान विकास का अवसर मिल सके।
Reference: jagran
बहुजन समाज पार्टी