प्रधानमंत्री की छवि हुई तार-तार

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मंगलवार को तीन सालों का रिपोर्ट कार्ड जारी कर भले ही अपनी सरकार की पीठ थपथपाएं, लेकिन गिनाने के लिए संप्रग-2 के पास अनिर्णय, अकर्मण्यता और घपले-घोटालों के अलावा बहुत कुछ नहीं है।

मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में उनकी ईमानदारी का कवच तार-तार होने के साथ ही जनता में कांग्रेस की गिरती साख ने सरकार की प्रतिष्ठा को और भी बंट्टा लगाया है। वित्ता मंत्री प्रणब मुखर्जी और उनके आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु दोनों ही परोक्ष तौर पर यह मान चुके हैं कि सहयोगियों के दबाव के चलते बचे दो साल में कुछ भी होना मुश्किल है।

संप्रग-2 के तीन साल का ज्यादातर समय प्रधानमंत्री और कांग्रेस के लिए सहयोगी संगठनों की मान-मनौव्वल में ही गुजरा है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस हो या करुणानिधि की द्रमुक, सरकार के किसी फैसले पर ज्यों ही सहयोगी दल का शिकंजा कसा, कांग्रेस के इशारे पर प्रधानमंत्री एक-दो नहीं, चार कदम पीछे हट गए। स्थिति ऐसी बन गई है जिसमें सरकार और संगठन दोनों ही लकवाग्रस्त दिखते हैं। घरेलू मोर्चो पर ही नहीं, मनमोहन की दूसरी पारी में विदेश नीति के मोर्चे पर भी गिनाने को कुछ नहीं है।

संप्रग-2 सरकार अपनी तीसरी वर्षगांठ के मौके पर एक कार्यक्रम का आयोजन कर रही है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री पिछले तीन साल में अपने कामकाज का रिपोर्ट कार्ड पेश करेंगे। प्रधानमंत्री ने इस मौके पर अपने नेताओं के लिए रात्रिभोज भी दिया है, जिसमें तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी और द्रमुक प्रमुख करुणानिधि दोनों अपने-अपने प्रतिनिधि भेजेंगे। शरद पवार के इस कार्यक्रम में उपस्थित रहने की उम्मीद है। ‘रिपोर्ट टू दी पीपुल’ नामक अपनी रिपोर्ट कार्ड में भ्रष्टाचार से निपटने और वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के बावजूद सतत आर्थिक विकास के लिए किए गए प्रयासों का जिक्र किए जाने की संभावना है।

बीते तीन सालों में सरकार के लिए सबसे ज्यादा दिक्कत उसके अपने ही सहयोगी बने हैं। राज्य में सत्ताच्युत होने के बाद द्रमुक केंद्र में लाचारी भरी स्थिति में है। 2 जी का दंश पार्टी प्रमुख की बेटी कनीमोरी समेत पूरी पार्टी झेल रही है, लेकिन जब श्रीलंका के मसले पर फैसला लेने का वक्त आया तो सरकार को द्रमुक के दबाव में अपना निर्णय बदलना पड़ा।

जहां तक ममता का सवाल है वो बात-बात में धमकी देती हैं। उनके चलते खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, पेंशन सुधार और डीजल के मूल्य को नियंत्रणमुक्त करने जैसे प्रस्तावों पर सरकार फैसला नहीं ले पा रही है। पवार पहले ही कह चुके हैं कि इस सरकार में हमसे पूछ कर फैसला नहीं होता।

सोनिया गांधी संप्रग के पहले कार्यकाल में पटकथा लिख रही थीं, वो अब नेपथ्य में हैं। राहुल का करिश्मा उत्तार प्रदेश, बिहार, पंजाब, उत्ताराखंड में नहीं दिखने के बाद उनकी संगठन पर हनक और इकबाल धूमिल पड़ता दिख रहा है।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का करिश्मा तो पहले भी नहीं था। अब ईमानदारी का उनका कवच भी टूट चुका है। ग्लोबल मंदी के दौर में सात फीसदी की विकास दर पाकर भले ही वे अपनी पीठ थपथपा लें, लेकिन भ्रष्टाचार और महंगाई से कमर तुड़वा बैठी आम जनता के लिए यह महज आंकड़ा भर है।

सरकार की इस हालत पर एक शायर ने शायद ठीक ही कहा है :-

सब अपने आप चलता जा रहा है, कहां कोई हुकूमत चल रही है। [Jagran]

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