अखिलेश सरकार ने मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ितों को कार्यक्रम करने तक की इजाजत नहीं

धर्म और संप्रदाय जैसे शब्दों से अंजान सात साल के मासूम समीर का एक हाथ दंगों की भेंट चढ़ गया। उसके कई सपने अब सपने ही रह जाएंगे। यह अकेले समीर की कहानी नहीं है। इसमें सलमा, काफिया, गुलशेर, मकसूद जैसे सैकड़ों हैं जिन्होंने सितंबर में पश्चिम उत्तर प्रदेश में भड़की हिंसा में या तो खुद पर सितम झेले या इस आग में अपनों को गंवा दिया। राहत के नाम पर भी इन पीड़ितों के साथ मजाक हुआ तो हुक्मरानों से गुहार लगाने के लिए राजधानी का रुख किया।

अपनी बात रखने के लिए पीड़ितों ने जयशंकर प्रसाद सभागार को चुना। सरकार से अनुमति भी ले ली। लेकिन पीड़ितों को राहत देने का दावा करने वाली सरकार ने ऐन वक्त पर उनके जख्मों पर नमक छिड़कते हुए उनका मंच ही छीन लिया और कार्यक्रम की अनुमति निरस्त कर दी। इसके बाद पीड़ितों ने अपने विरोध को सरकार तक पहुंचाने के लिए शनिवार को कैसरबाग से विधान भवन तक विरोध मार्च निकाला। पीड़ितों ने सदभावना समिति की रिपोर्ट पर भी सवाल उठाए हैं।

रिहाई मंच के प्रवक्ता शाहनवाज आलम, राजीव यादव के साथ सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडेय के नेतृत्व में दंगा पीड़ितों की जनसुनवाई के लिए जयशंकर प्रसाद सभागार में शनिवार को कार्यक्रम आयोजित किया था। इस कार्यक्रम के लिए प्रशासन से अनुमति भी ले ली गई थी। शनिवार को तय समय पर लोग कार्यक्रम स्थल पहुंचने लगे। कार्यक्रम शुरू होता इससे पहले उन्हें बताया गया कि प्रशासन ने कार्यक्रम की अनुमति निरस्त कर दी।

वजह बताई गई कि सभागार के कर्मचारी हड़ताल पर हैं। पीड़ित और आयोजक बिफर गए। इसके बाद सभी पीड़ित कैसरबाग स्थित बारादरी के पास आ गए और वहां से विधानभवन तक मार्च निकालने की मांग की। विरोध होने और माहौल बिगड़ने की आशंका देखते हुए पुलिस प्रशासन ने उन्हें मार्च निकालने की छूट दे दी। सरकार विरोधी नारे लगाते हुए पीड़ितों ने विधानभवन तक पैदल मार्च किया। जगह-जगह पुलिस तैनात रही। मार्च के चलते कैसरबाग से विधान भवन के बीच कई बार जाम भी लगा।

आखिर में पीड़ित विधान भवन के सामने एसीएम को ज्ञापन सौंपकर लौट गए। बताया जा रहा है कि आयोजक कार्यक्रम के दौरान दंगों से जुड़ी विवादित सीडी दिखाने वाले थे। इससे माहौल बिगड़ने की आशंका थी इसलिए कार्यक्रम की अनुमति निरस्त कर दी गई। हालांकि अफसर इस पर खामोश हैं।

नहीं मिला मुआवजा
दंगों का शिकार बने बागपत के काठा के मकसूद के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। नौ सितंबर को कुछ लोग उसके भाई चांद को घर से बुला ले गए थे। बाद में चांद की लाश पड़ोस के गांव में मिली और पुलिस ने अज्ञात मानकर उसका अंतिम संस्कार करा दिया। मकसूद का कहना है कि अब तक कोई मुआवजा नहीं मिला है। कुछ ऐसा ही दर्द मुजफ्फरनगर के नाला निवासी मोहम्मद दावर का है। दंगाइयों ने दावर और उसके दो भाईयों के घर जला दिया था। मदद के नाम पर सिर्फ आश्वासन मिला है।

सरकार जिन महापंचायतों पर रोक लगानी थी उन्हें होने दिया। उन्हीं पंचायतों के चलते दंगे भड़के और बड़ी संख्या में लोगों की जान गई। अब पीड़ित सरकार के सामने अपना दर्द रखना चाहते थे तो उनके कार्यक्रम को निरस्त कर दिया गया। यह दर्शाता है कि सरकार दंगा पीड़ितों के लिए कितनी चिंतित है।
संदीप पांडेय, सामाजिक कार्यकर्ता

कार्यक्रम की अनुमति नहीं ली गयी थी। प्रशासन को आशंका हुयी कि इससे शांति व्यवस्था प्रभावित हो सकती है, इसलिए कार्यक्रम रोका गया।
पीपी पाल, सिटी मजिस्ट्रेट

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